नवगीत
गाँव-नगर में शोक-सभाएँ
क्या गाऊँ दरबारी राग ।
दियासलाई हेर-हेर कर
मौन रहा चूल्हे में चिमटा ।
कामकाज की दौड़धूप में
साल गया गमछे में लिपटा ।।
संघी-वामी वमन करेंगे
लेकर अपनी-अपनी लाग ।
कविताओं का धर्म लजाने
अब गंगा उल्टी बहती है ।
मौन रहे तो मंच मिलेंगे
इक दीदी नित यूँ कहती है ।।
मन कबीर का तड़प रहा है
कहे काग को कैसे काग ।
सोन-चिरैया बेचे राजा
मोल चुकाने तीन बेर का ।
हर इक महिने नाज मिलेगा
निर्धन को बस पांच सेर का ।।
कांधे-अर्थी सुनो घोषणा
शमशानों जागा बैराग ।।
:मोहन पुरी
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